खोखली होती “खेती-किसानी” की जड़ें


भारतवर्ष में, विगत कुछ वर्षों से कृषि उत्पादकता (प्रति हेक्टेयर) स्थिर हो गयी हे तथा कुछेक फसलों में तो गिरावट भी देखने को आयी हे | इससे किसानों की समस्या निरंतर बढती जा रही हे | कृषि कार्यो में बढती लागत तथा घटते उपज मूल्य किसानों की चिंता के प्रमुख कारण हें | विभिन्न सरकारों की असंवेदनशील कृषि नितियों के कारण किसान आत्म हत्याओं तो मजबूर हो रहे हें | जलवायु परिवर्तन तथा गिरते मृदा स्वस्थ्य की समस्याओं के साथ साथ अपर्याप्त बिजली, पानी, तथा महंगे खाद, बीज, डीज़ल के कारण किसान कृषि-कार्यों से पलायन कर रहे हें | किसानों की निरंतर बढती समस्याओं की रोकथाम एवं उनके निवारण तथा कृषि उत्पादकता में सतत वृद्धि के लिए अगर त्वरित कार्य-योजन नहीं किया, तो अन्नदाता के पुत्र अपराधिक गतिविधियों की और प्रवर्त हो जायेंगे |

भूमि किसान की माँ होती हे | निरंतर छोटी होती जोत तथा अन्य उपयोग हेतु बढ़ते भूमी-अधिग्रहण के कारण, माँ के प्रति उसके अनुराग में सतत क्षरण हो रहा हे | अतः आवश्यक हे कि कृषि भूमि का, गैर कृषि कार्यो में निरंतर बढ़ते उपयोग को रोका जावे | जहाँ कृषि-भूमी का अधिग्रहण आवश्यक हो, वहां किसान हितों का पूर्ण संरक्षण किया जावे | सरकार को चाहिए कि इसके लिए एक समग्र निति निर्धारित करे |

कृषि एक ऐसा क्षेत्र हे जहाँ उत्पादक अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं करता | सरकारी नीतियाँ, किसानों की घोर अनदेखी करते हुए बिचोलियों तथा आढ़तियों के हितों का संरक्षण कर रही हे | कृषि उत्पादों, खास तौर पर सब्जियों एवं फलों पर लगने वाले शुल्क तुरंत समाप्त किये जावें | समय की आवश्यकता हे कि मोजुदा व्यवस्थाओं की समीक्षा कर किसान-हितेय, विज्ञानं सम्मत कृषि विपणन व्यवस्था विकसित की जावे | अन्यथा सूचना प्रोध्योगिकी के इस युग में किसान को अधिक ठगा जायेगा | किसानों को सीधा मंडी से जोड़ने हेतु किसान बाज़ार स्थापित किये जावें |


कृषि आज लाभ से दूर हानी का व्यवसाय होता जा रहा हे | बढती लागत कृषि में होने वाली हानि को निरंतर बढ़ा रही हे | सरकारों को चाहिए कि कृषि में प्रयुक्त सभी मशीनों, खाद, बीज, दवाइयां, डीज़ल, पानी इत्यादि की कीमतें उसके उत्पाद की कीमतों के समरूप हो | उसे सब्सिडी नहीं, सम्यक मूल्य प्रदान कराने की नीतियाँ तथा उनका उचित किर्यान्वयन चाहिए | कृषि कार्य हेतु बिजली की सप्लाई निर्बाध हो तथा बिजली की दरें न्यूनतम हो |

कृषि एक जोखिम भरा कार्य हे | मौसम पर इसकी पूर्ण निर्भरता इस जोखिम में घाव करती रहती हे | विभिन्न बिमा योजनायें, जिसमें प्रधान मंत्री फसल बिमा योजना भी एक हे, इस जोखिम के घावों को भरने में अक्षम सिद्ध हुयी हे | क्यों ये अभी तक किसानों का भरोसा नहीं जीत पाई हे, उन कारणों की गहराईयों में जाकर फसल बीमा योजनाओं को किसान संगत बनाने की प्रबल आवश्यकता हे | कृषि से संबंधित सभी व्यवसायों को तथा सभी आपदाओं से होने वाली जोखिम को ध्यान में रखते हुए बीमा कार्य किए जाएं | किसानों के लिए उपलब्ध प्रशिक्षण व्यवस्था बहुत ही लचर एवं दोषपूर्ण है | अतः इसमें आमूलचूल सुधार की आवश्यकता है, जिससे खंड स्तर पर समग्र प्रशिक्षण व्यवस्था उपलब्ध करवाई जा सके | कृषि विश्व-विद्ध्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् तथा राज्य/केंद्र सरकारों को, किसान संगठनों एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ मिल कर, जबाबदेही परक प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करनी चाहिए |

कृषि में हुए शोध तथा विकसित तकनीकों का लाभ किसनोंतक नहीं पंहुच रहा हे | इस गंभीर विषय से जुड़ी मांग हे, खस्ता हाल कृषि विस्तार व्यवस्थाओं का आधुनिकीकरण | प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रशिक्षित कृषि सहायक की नियुक्ति समय की आवश्यकता हे | जब तक ग्राम पंचयत स्तर पर ये सेवाएँ कायम नहीं होंगी कृषि शोध कागजों एवं भाषणों तक ही सीमित रहेगा | कृषि विस्तार में सूचना प्रोद्योगिकी का प्रचुर उपयोग विज्ञापनों हेतु अवश्य हे, परन्तु ज्ञान विस्तार में नगण्य हे | राज्य स्तरीय टेलीविजन, जिला स्तरीय रेडियो, सामुदायिक रेडियो, स्थानीय प्रिंट मीडिया तथा अन्य व्यवस्थाओं के माध्यम से स्थान परक एवं सम-सामयिक कृषि विस्तार किया जाए |

आज मजदूरों की कमी एवं खेती के कामों में कठिनता के मद्देनजर कम लागत वाले कृषि यन्त्र विकसित करने की जरूरत हे, जो छोटी जोत पर प्रभावी रूप से काम करे | अतः उचित यंत्रों/मशीनों का निर्माण करवाया जावे ताकि किसान को बड़ी मशीनें भाड़े पर नहीं लेनी पड़े | जिससे किसानों का कृषि कार्यों से पलायन रूके तथा छोटे एवं मंझले किसानों के खेतों में कृषि कार्य सुचारु रुप से करने के लिए सशक्त किया जा सके | राष्ट्रीय किसान विकास योजना तथा महात्मा गांधी नरेगा स्कीमों का अधिक से अधिक कृषि विकास, भूमि विकास एवं खेत आधारिक संरचना विकास योजनाओं के साथ जोड़ा जावे|

निसंदेह राष्ट्र का विकास सर्वोपरि हे, परन्तु इस विकासक्रम में किसान के हितों को सर्वोच्च रखा जावे तथा सभी नीतियों के निर्धारण में खेती-किसानी को केंद्र में रखते हुए नीतियां बनाई जावे | अन्यथा अर्थ व्यवस्था का यह महत्वपूर्ण मूल, जो आजादी के बाद से निरंतर लड़खड़ा रहा हे, उखड ही जायेगा | डॉ लक्ष्मण सिंह राठोड़
विश्व मौसम संगठन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि एवं कार्यकारिणी के सदस्य
उपाध्यक्ष, जलवायु सेवा के अंतर सरकारी बोर्ड, संयुक्त राष्ट्र संघ
पूर्व महानिदेशक, भारत मौसम विज्ञान विभाग

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